रंगीन-ए-जमाल में डूबी -सलीम रज़ा

रंगीन-ए-जमाल में डूबी हुई मिलेयानी मेरे सुख़न को नई रोशनी मिलेवो चांदनी जो आबरू है आसमान कीऐसा न हो ज़मीन पे घायल पड़ी मिलेकल की मुझे उमीद नहीं है मेरे ख़ुदामेरे नसीब में है जो मुझको अभी मिलेये है दुआ तुम्हारा मुकद्दर बुलंद होतुमको तमाम उम्र ख़ुशी ही ख़ुशी मिलेमिलता रहा ख़ुलूस-ओ-महब्बत से जो ‘रज़ा’मिलता है आज,जैसे कोई अजनबी मिले

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  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/11/2019
  2. SALIM RAZA REWA SALIM RAZA REWA 22/11/2019

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