अंगड़ाई – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

अंगड़ाई

कल – कल करती बहती नदियां
चलती सनन – सनन पुरवाई ।

झूम – झूम के हवा वसंती
लेती है खूब अंगड़ाई।

वन-उपवन सब हरा भरा है
हंस रही देखो अमराई।

मंजर उसके महक रहे हैं
उसपर है चमकी अरुणाई।

कोयल की वह मीठी बोली
पैठ रही दिल की गहराई।

विरह की तो बात मत पूछो
वह साजन से है शरमाई।

काजल टिकुली बिंदिया बिछुआ
वो क्या जाने पीर पराई।

दिल के बंधन रिश्ते सारे
माया – ममता- प्रेम – तन्हाई।

ढूंढ रहा संसार में “बिन्दु”
सब लोगो का मीत – मिताई।

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6 Comments

  1. Ram Gopal Sankhla Ram Gopal Sankhla 19/11/2019
  2. M.Mikrani 19/11/2019
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 20/11/2019
  4. SALIM RAZA REWA SALIM RAZA REWA 21/11/2019
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/11/2019
  6. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 23/11/2019

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