पढ़ता रहा नमाज – शिशिर मधुकर

कोई तड़प रहा है कहीं मेरे लिए भी आज
उलफत में आदमी कभी आता नहीं है बाज

कुदरत की महर हो गई तुम सहसा मिल गए
कोई ना कोई है छुपा देखो इसी में राज

सब कुछ तुम्हें बता दिया अब ना करो शरम
रूहों के मेल में कभी होती नहीं है लाज

हिम्मत रखो ना आह भरो मिलने की आस में
बिन शोर के हर इक तरह पूरे करेंगे काज

बलिदान मांगता है इश्क हरगिज ना भूलना
इस खेल में सुनो कभी मिलते नहीं हैं ताज

जब से मिले हो तुम मुझे दीवारें तोड़ के
कैसे कहूं कि होने लगा मुझको भी खुद पे नाज

माना कि देर हो गई मधुकर ना पर डिगा
अल्लाह की बारगाह में वो पढ़ता रहा नमाज

शिशिर मधुकर

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6 Comments

  1. vijaykr811 18/11/2019
    • Shishir "Madhukar" 19/11/2019
  2. C.M. Sharma 20/11/2019
    • Shishir "Madhukar" 20/11/2019
  3. डी. के. निवातिया 22/11/2019
    • Shishir "Madhukar" 23/11/2019

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