उम्मीद-ए-खाख:-विजय

करने चला था घर को रोशन
अपने उम्मीदों के चिराग से
जला गए मेरे वो सारे आशियाँ
बस धुंध बचे है मेरे मज़ार पे

तमन्ना थी कुछ कर गुजरने की
गुजर गयी जिंदगी कुछ के इंतज़ार में
हर पल ढूंढता रहा जो मैं ख़ुशी
मिली वो मुझे गुजरे पल के याद में

सोचा करूँगा अपने दर्द का सौदा
पर हर शख्स दर्द ही बेच रहा बाजार में
हौसलो के पंख संग उड़ा हर बार
पर खो जाता धुंध भरी ऊँचे आसमान में

जब भी बढ़ाया समझ की कदम
होते गया शामिल नासमझों की जमात में
अब इन बचे सांसो का क्या करूँ
मतलब नही जिनका मतलबी संसार में

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2 Comments

  1. SALIM RAZA REWA 16/11/2019
    • vijaykr811 18/11/2019

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