आँख मिचौली – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

तुम अगर चलोगे पात – पात
मैं डाल – डाल पर आऊँगी।
तुम जितना ढूंढोगे मुझको
उतना ही मैं तड़पाऊँगी।।

स्नेह का यह खेल निराला
जिस भी दिल में बस जाता है।
हाल न उसका पूछो साथी
वह दलदल मे फंँस जाता है।।

जब तक होती आँख मिचौली
समझ में नहीं कुछ आता है।
दिल इतना पागल बन जाता
नयनों पर वह छा जाता है।।

चैन – वैन सब खो जाता है
मन, यादों की गहराई में।
ख्वाहिशों में उलझ जाता है
तकदीरों की तरुणाई में।।

यह कैसा रिश्तों का बंधन
या द्वंद है उन फरिश्तों का।
जहाँ दर्द ही दर्द मिलता है
संगम कैसा यह जीस्तों का।।

प्यार किसी का फलता भी है
उससे ज्यादा वह छलता है।
थोड़े में आपे से बाहर
होकर ये खूब मचलता है।।

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  1. vijaykr811 vijaykr811 15/11/2019

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