दोहा ग़ज़ल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

दोहा ग़ज़ल

रहा भटकता दर – ब – दर, मिले नहीं भगवान
मैं पागल सा बन गया, धन पाकर धनवान।

रिश्ते – नाते सब छुटे, अरु कुटुम्ब परिवार
पैसों के खातिर बने, लालच में हैवान।

बड़ी हवेली काटती, मिले कहाँ कब चैन
अपनापन दिखता नहीं, लगे सभी शैतान।

गयी जवानी ऐश में, अब बूढ़ा बीमार
अंत समय पछता रहा, रो – रो कर इंसान।

यह जीवन अनमोल है, सोच समझ कर तोल
कर्म सदा ही याद रख, धर्म – मर्म पहचान।

दौलत या बल पास में, रहे कहाँ कब कैद
अहंकार मत कीजिये, रखिये इतना ध्यान।

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  1. SALIM RAZA REWA 16/11/2019

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