ककक

रविशंकर
कहानीकार – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु
बाढ़ – पटना
रविशंकर कोई हनुमान नहीं था, जो धवलागिरी जैसे पर्वत को उठाकर लंकापुरी से होते हुए ले आता ।वह तो साधारण सा (मनुष्य) इंसान था। जिसमें कमाल की शक्ति निहित थी। हनुमान जैसा तो नहीं जो देखते-देखते सूरज को निगल गया और हंसते-हंसते सागर को लाँघ  गया। कहा जाता है कि रविशंकर पर हनुमान जी हमेशा सहाय रहते थे। रहते भी क्यों नहीं होंगे, इसलिए कि वह अपने दोनों हाथों के बल व्यस्क हाथियों को बे हिचक एक – एक कर हवा में उठाकर दौड़ते फिरते । लोगों  को यह देखकर बड़ा आश्चर्य होना पड़ता था। सभी लोग दंग रह जाते थे। सब कहते थे यह कोई जादू टोना या नजर बंद है, पर अवधपुर वाले  लोग इसे बिल्कुल ही सत्य मानते थे।
आज से लगभग सात हजार वर्ष पूर्व इनका अखड़ा उत्तर भारत में हिमालय के इर्द-गिर्द ही बताया गया है। पंडित सोमनाथ निराला के अनुसार इनकी भाग्य रेखा किसी जलते दीपक जैसा ही प्रज्वलित था। यह उनके अगले जन्म में कठोर तपस्या का ही फल बताया गया है ।
  एक रात धरती काँप जाती है।जोरों का भुचाल आ आता है और एक झटके में ही सारा खेल बिगाड़ कर तहस – नहस हो जाता है। एक ऐसा भूकंप जिसमें हजारों की जानें चली जाती है।  जीव जन्तुओं को बचने का भी कोई ठिकाना नहीं रहता है ।  जैसे – तैसे तवाह होकर वो भी सारे मारे गये। कोई उनका ठिकाना शेष न रहा । चारो तरफ कोहराम सा मच गया । जान – माल की भारी क्षति हुई। पुरखों का बना बनाया रविशंकर का अखड़ा हिमालय के टूटकर ढहने से ढ़क गया । हिमालय चौड़ा हो गया । शिखर के कुछ भाग उसके टूटे और धरती में समा गये।  मानो जैसे सैकड़ो बादल एक साथ फट गये हों।बर्फ का अम्बार सा दृश्य बन कर रह गया। पहले हिमालय की ऊंचाई आज की ऊंचाई से डेढ़ गूनी अधिक बताई जाती है। तब रविशंकर बर्फ के दलदल में खुद भी फंस कर रह गया था। चार दिन पूरी कोशिश के बाद भी वह इस वर्क रूपी दलदल से बाहर नहीं निकल पाया । उनकी हिम्मत उसे जवाब देती नजर आने लगी , पर उसकी कोशिश जारी रही। वह अपने आप से हार नहीं माना। आखिरकार उसे सफलता मिल ही गई।वह बहुत खुश था। उसने मौत को मात देकर अपने आप को बचाया था। तब हिमालय की गोद से निकलने वाली गंगा मैया उसे साक्षात दर्शन भी दे दी थी। गंगा मैया खुश होकर रविशंकर को वर मांगने को कहा था । उस समय रवि शंकर इस आश्चर्य को देख कर दंग सा रह गया था। प्रज्वलित मुख मंडल वाली इस देवी का दर्शन पाकर वह धन्य हो गया। उनके चरण में वह दंडवत कर देवी के सामने नत मस्तक हो गया। वर में उसने आजीवन जिंदा रहने की इच्छा जाहिर कर दी। इस तरह रविशंकर को आजीवन जिंदा रहने का गंगा मैया से वरदान भी प्राप्त हो गया , पर गंगा मैया उसकी मौत एक सांप काटने से बता दिया। इस तरह का वरदान पाकर वह बहुत खुश था । एक क्षण के लिए रविशंकर घबराया फिर उसने सांप से कोसों दूर रहने को भी सोच ली। वरदान पाकर रविशंकर बाग – बाग तो हुआ ही उसकी आंखें सिर पर हो गई।अब उसे न तो आग से डर थी ना पानी से ना भूचाल से डर था और ना ही उसे तूफ़ानों से ही डर लगता था। बस उसे डर थी तो एक मामूली सांप से, जो उसे डंसकर मौत की सय्या पर लाकर सदा के लिए गहरी नींद में सुला सकता था।
पहले तो रविशंकर इंसानियत के तौर-तरीके पर ही चलता रहा, पर जबसे उसे वरदान प्राप्त हुई ,वह किसी को कुछ भी  समझने से इन्कार करने लगा। वह  काल रूपी विकराल दानव जैसा खूंखार सा बन गया। उसके आचरण उसका व्यवहार एकाएक बदलते चले गये। रावण के जैसा अत्याचारी बनकर आतंक ही आतंक फैलाने लगा। यहां तक कि बड़े-बड़े राक्षस उससे पनाह  मांगने लगे।जिघर भी जाता उस इलाके में दहशत ही फैल जाती। लोग उससे थर-थर कांपने लगते। यह भी कहा जाता है कि एक बार वह घूमते – घूमते भुतहिया जंगल भी पहुँच गया था। यह जंगल आज झारखंड के हजारीबाग जिले के इर्द – गिर्द बताया जाता है ।  उस समय उस घनघोर जंगल में  दो भयंकर शक्तिशाली राक्षस  निवास करते थे  ।पहले तो वे राक्षसराज   रवि शंकर पर  टूट से पड़े , पर जब रविशंकर का हाथ उन दो  राक्षसों पर पड़ा तो उनकी नानी याद आ गई। आज तलक किसी से न डरने वाला राक्षसराज  कुछ समय के लिए भयभीत होकर सोच में डूब गये। राक्षस उसकी शक्ति देख भाग खड़े हुए। रविशंकर उसे खदेड़कर पारसनाथ के पहाड़ तक ले गया। उस दौरान दोनों राक्षस दौड़ते-दौड़ते  बुरी तरह से थक कर चूर हो गये थे , तभी रविशंकर ने उसे दबोच डाला। इस तरह रविशंकर को उन राक्षसों का संहार करने में  बड़ा मजा आया , लेकिन दक्षिण भारत में एक मायावी राक्षस ने उसके छक्के छुड़ा दिए। हुआ यूँ कि वह राक्षस रविशंकर से पराजित होने का नाम ही नहीं ले रहा था। महीनों तक इनकी जंग इसी तरह से चलती रही। घनघोर जंगल मैं वह राक्षस कभी भैंसा का रूप तो कभी गीध का रूप धारण कर लेता। इस दौरान राक्षस अपना वेष बदलकर अलग अलग तरीके से रविशंकर पर आक्रमण करता रहा । कभी वह सामने आ जाता तो कभी दूर बहुत दूर। इस तरह रविशंकर उससे काफी परेशान सा भी हो गया था। कभी वह माथे पर हवा-हवाई बनकर मंडराने लगता, तो कभी अपनी नुकीली लम्बी चोंच से उसे घायल करके  दूर भाग जाता।  फिर भी रविशंकर को उस से थोड़ी भी डर न थी। अंत में राक्षस रविशंकर से परेशान होकर शरण ले ही लिया। जब रविशंकर को अपना शिकार खोजते नहीं मिला था तो वह भूखे शेर की तरह लोगों पर दहाड़ने लगा और इस तरह उसकी आतंक फैलती सी चली गई। आज लोग उससे काफी परेशान सा हो गए। अब तो वह राह चलते जिसको – तिसको पकड़ कर दबोचने भी लगा था। उन दिनों लोग भगवान शंकर की पूजा उपासना करते थे। उन सबकी पूजा भक्ति से शंकर भगवान की नींद खुल गई। वह  देखे कि मृत्युलोक में तो बड़ा अनर्थ हो रहा है। अगर रविशंकर को संहार न किया गया तो अनर्थ हो जाएगा। इस तरह तो एक दिन सारी सृष्टि ही नाश हो जाएगी। नारदजी को सारी बातें  पूर्व से ही सर्व विदित  थी। तभी नारदजी भागवान शंकर के पास आए और नारायण – नारायण की आवाज के साथ बातचीत शुरू हुई । देवताओं में सभा बुलाई गई पर किसी को पता ना चला कि वह कैसे मारा जाएगा। तभी उस सभा के बीच गंगा मैया आ गई और ब्रह्मा विष्णु महेश को हाथ जोड़कर सादर प्रणाम की। गंगा मैया बताने लगी…. रविशंकर ने अगले जन्म में मेरी कठोर तपस्या की थी, पर अगले जन्म में मैंने उसे दर्शन न दे सकी । इस बार मैंने उसे दर्शन दिया जबकि वह कठोर संकट से भी मुक्त हो गया था। मैंने उसे वर मांगने को कहा….. मैंने बरदान मे उसे आजीवन जिंदा रहने को कह दिया पर वह तो अब आतंक ही फैला कर रख दिया है। मैंने इसकी मौत एक साधारण सांप काटने से बताया है।
वह सांप से डरता है। उसकी मौत उसी से होगी। मैंने उससे वरदान में यह भी कहा था । आश्चर्य से सभी की आँखे फैल कर रह गई। ब्रम्हा – विष्णु – महेश सारे देवता गण हैरान से रह गये। उनलोगों को लगा जैसे कोई हल मिल गया हो। तभी विष्णु जी ने शंकर जी को अपना काला नाग छोडने का आग्रह कर दिया। यह प्रस्ताव सारे देवताओं को अच्छा भी लगा था। भगवान शंकर के गले में निवास करने वाला वह काला नाग उनके गले का शौर्य बढ़ाने वाला एक आभूषण था।  सब के अनुनय – विनय पर भगवान शंकर को काला नाग कुछ समय के लिए अपने गले से छोड़ना पड़ा।
उस दिन रविशंकर दूध का मटका अपने मुँह में लगाये घटर-घटर दूध पीने में मग्न था। एकाएक जब उसने सांप को अपनी तरफ आते देखा, तो उसकी जान ही सूख गयी। इस तरह सांप को अपनी तरफ आते देख, उसके पाँव  जमीन से उखड़ गये। आँखों तले अंधेरा छाने के बाद, तारों के समूह झिलमिलाते से नजर आने लगे। तब वह भागता गया और काला नाग उसे खदेड़ता। वह बचने की पूरी कोशिश करता रहा । पीछे मुड़ मुड़कर देखता और अपनी मौत नजदीक देखकर घबरा भी जाता। बे मौत मारा जाऊगाँ। गंगा मैया हमें ठीक ही बता कर गयी है। अगर यह काला नाग मेरे पास आया तो वह सचमुच मुझे डंस लेगा और मेरी मौत हो जायेगी। एक साथ कई प्रश्न उसके माथे में धूमकर रह गया। उसके दिलोदिमाग में कई प्रश्न एक साथ घर कर रहा था। उसके मस्तिष्क एक ही झटके में किसी रिंग की भाँति घूम गई। वह चक्कर खाकर गिरता उससे पहले काला नाग उसे डंस कर वापस जाने लगा ।रविशंकर पल भर में ही कराहते हुए जमीन पर धड़ाम से गिर गया, और वह सदा के लिए मौत की नींद सो गया। काला नाग वापस भगवान शंकर के गले विराजमान हो गया। सारे देवताओं ने मिलकर खुशियाँ मनाई। लोग यह देख – सूनकर खुशियों से झूम उठे और आपस में मिलकर जश्न भी मनाए। मन में बैठा हुआ खौफ कोसों दूर भाग गया। सब लोग खुशी – खुशी रहने लगे।सब कुछ पहले जैसा हो गया। कभी कभार बीच – बीच में उसकी चर्चा किसी की मुँह से निकल ही आती, पर डर बिलकुल ही  न था। वाह रे रविशंकर, अंहकार मनुष्य को मात देकर चला गया।

बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

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