बर्बरीक – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

वेद व्यास एक थे ऋषि, वह युग था द्वापर काल
प्रागज्योतिषपुर में, दैत्य था एक विकराल।
अद्भुत ज्ञान भंडार था, अद्भुत था सौगात
स्कंद पुराण में लिखा, देव – दानव की बात।
इसी युग में चतुर्भुज ने, लिये कृष्ण अवतार
आतंक देख दैत्य राज की, दिये गर्दन उतार।
दैत्य राज मूर का, कोई नहीं था जोड़
भाग जाते सब देखकर, रणभूमि को छोड़।
पुत्री उनकी एक, नाम था कामकंटककटा
भक्त कामख्या की थी, शक्ति रूपिनी त्रिजटा।
प्रतिशोध पिता का लेना था, बस ढूंढ रही थी वह सेना
जब पहुँची वह युद्ध भूमि, तो शांत पड़ा था सब खेमा।
भीमसेन की सेना में, अद्भुत थे उनके भी योद्धा
वहीं कुद कर आ गयी, ललकार लगाई बिजली कौंधा।
भीमसेन की थी सेना, जहाँ कृष्ण सुदर्शन चक्रधारी
वह मूर कन्या मोरवी थी, जो रण क्षेत्र में पड़ी भारी।
प्रहार से योद्धा मूर्छित थे, तब क्रोध आया मुरारी को
मोरवी जान समझ गयी, अब हनन करना त्रिपुरारी को।
वह स्वयं युद्ध करने लगी, भयंकर गर्जना के साथ
सारे अस्त्र उनके विफल हुए, खाई नहीं वो मात।
मोरवी की वध ठानकर, प्रभु उठा लिए सुदर्शन चक्र
तभी कामाख्या आ गयी और भक्त पर जताई फक्र।
कामाख्या विनय करने लगी, माता त्रिपुरारी के पास
कामकंटककटा मेरी परम भक्त, वह है मेरी दास।
परब्रह्म जगतपति, माँ की समझ गये सब बात
गलती मोरवी की माफ किए, मोरवी भी जोड़ी हाथ।
क्षमा कर दो हमें हे प्रभु, मुझे भटकाया था प्रतिशोध
पिता के कारण आक्रोश में, मुझको आया था क्रोध।
माता मोरवी से कही, ये हैं भावी श्वसुर तुम्हारे
दानवी शक्ति नष्ट हुए, तुममें आ गये शक्ति हमारे।
मूर्छित सेना तब सजग हुए, सजग हो गये भीम सेन
लीला ऐसी यह देखकर, सब सोचे कुदरत की देन।
श्री कृष्ण के आदेश पर, घटोत्कच की हुई विवाह
शास्त्रार्थ प्रतियोगिता मोरवी की, हो गई वाह – वाह।
पिता भीमसेन महाबली, माता का नाम हिडिम्बा था
पर तीर्थाटन में थी माँ गई, लौटना बड़ा अचंभा था।
हिडिम्बा को श्री कृष्ण ने, आये लेकर अपने साथ
पुत्रवधू को देखकर, अनको मिल गयी उनकी शौगात।
बड़ों का खूब आशीर्वाद मिला, जीवन हो गया धन्य
पुत्र लाभ भी उनको हो गया, बर्बरीक का हुआ जन्य।
दादी हिडिम्बा ने सिखलायी, उसे सत्य धर्म की बात
सफल बनाया था जीवन उसका, सत्य का सिखाया साथ।
यूं तो महाभारत एक वाण में कर देता वो अंत
इसलिए बर्बरीक ललकार किया खट्टे किये सब दंत।
अपने तपो बल से उसने अपने को अजय बनाया था
ऐसा नहीं था दुनिया में कोई जो बल वो पाया था।
महाप्रतापी महाबली बर्बरीक का हुआ अवतार
मोक्ष की प्राप्ति हेतु उनको कृष्ण ने किया संहार।

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