बात बड़ी है – डी के निवातिया

बात बड़ी है

हिय-उपवन में,
लालसा के अंकुर फूटे,
मंत्रमुग्ध हो,
गौरैया सी चहचाने लगी,
क्षितिज की शाख पर,
क्रंदन करती, फुदकती,
नवजीवन के सपने संजोती,
सप्तरंगी सपनो में रंगी,
बहुरंगी पुष्पों संग पली,
पग उठा आगे बढ़ी,
बाज़ार में मोल हुआ,
ख़ाक के भाव,
अस्मित लूटी है,
दीपक की लौ में,
शीत से लड़ी है,
गूंगी बहरी मतलबी दुनिया में,
खुद को संभालने खुद से अड़ी है !!
!

बात बड़ी है
पर, मुख पे ताला डाले खड़ी है !!


स्वरचित: डी के निवातिया


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8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 05/11/2019
    • डी. के. निवातिया 22/11/2019
  2. Ram sroop singh 07/11/2019
    • डी. के. निवातिया 22/11/2019
  3. M.Mikrani 19/11/2019
    • डी. के. निवातिया 22/11/2019
  4. Ram Gopal Sankhla 05/12/2019
    • डी. के. निवातिया 05/12/2019

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