प्रेम – डी के निवातिया

प्रेम कविता


जिसका प्रदर्शन हो,
वो प्रेम नहीं,
नयनों से दर्शन हो,
वो प्रेम नहीं !!
!
जो हम-तुम करते है,
प्रेम वो नही,
जो मन मे विचरते है,
प्रेम वो नही !!
!
कलम के आंसुओ का,
नाम प्रेम नहीं,
पल-पल बदलते भावों का,
नाम प्रेम नहीं !!
!
प्रसंगो की उत्पत्ति
प्रेम आधार नहीं,
आकर्षण में लिप्त होना,
प्रेम का संचार नहीं !
!
प्रेम खुद में छुपा रहस्य है,
सृष्टि के मूल का तथ्य है,
!
प्रेम तपस्या में पाना नहीं,
स्वयं को लुटाते जाना धर्म है !
!
अनुभूतियाँ समाहित कर
वैराग्य में खो जाने का यत्न है !
!
प्रेम जिज्ञासा में प्रस्फुटित
समर्पण के अंकुरों का तंत्र है !
!
प्रेम ही जीवन का मूल मन्त्र है !
प्रेम स्वयं में बसा गूढ़ ग्रन्थ् है !!


स्वरचित: डी के निवातिया

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8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 07/01/2020
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 14/03/2020
  2. अंजली यादव अंजली यादव 20/05/2020
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 20/05/2020
  4. rakesh kumar rakesh kumar 21/05/2020
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/05/2020
  5. vijaykr811 vijaykr811 23/05/2020
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 26/05/2020

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