ग़ज़ल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

ग़ज़ल

अपनी रज़ा में जीना दुश्वार लगता है
गिरेबान में झाँको तो बुखार लगता है।

बड़ी दुष्कर है जिंदगी यकीं होता नहीं
फरेब इतना कि सब कुछ बेकार लगता है।

जिधर भी हैं जाते उनकी मर्जी चलती है
जलाते दीप भी तो अंधकार लगता है।

खता करते हैं तो उलझ जाता है कोई
हर शै अब मुझे तलवार की धार लगता है।

सुना है गरीब के दिल इंसान बसते हैं
न लालच न कोई सत्रु वह गफ्फार लगता है।

भीतर घात करने वालों की खामी कहाँ
भले लोग फंसते जहाँ बाजार लगता है।

जमाने से शिकवा नहीं है मेरे दोस्त
दिल तो सबका है किन्तु बीमार लगता है।

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2 Comments

  1. C.M. Sharma 25/10/2019
  2. Bindeshwar prasad sharma 26/10/2019

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