प्रकृति के वासी

।।प्रक्रति के वासी।।
हम गरीब है साहव, हमे वनो मे ही रहने दो
दो जून की रोटी मे ही हम सबको खुश रहने दो
हम गरीब है साहव हमे वनो मे ही रहने दो
हमे नही महलो की चाहत, ना ही है गहनो की चाहत
नही चाहिये सुदंर कपड़े , ना ही चाहिये सुदंर मुखड़े
हमे चाहिये कुटुंब कबीला, धरती बिछौना अंबर नीला
प्रक्रति की गोद मे हमको परिवार सहित रहने दो,
हम गरीब है साहब, हमे वनो मे ही रहने दो
दो जून की रोटी मे ही हम सबको खुश रहने दो
हम ना मागे माल खजाने, हम ना जाने गीत तराने
मा बसुंधरा के आंचल मे , प्रक्रति पुत्र वने रहने दो
हम गरीब है साहब , हमे वनो मे ही रहने दो
ना चाहत हमको फूलो की, ना चाहत हमको झूलो की
ना जाने हम कोर्ट कचहरी , ना जाने हम धूप दोपहरी
ये वनो की भूमि है साहव वनो मे ही रहने दो
हम गरीब है साहब , हमे वनो मे ही रहने दो
ये भूमि पशुओ का है घर, नदियां बहती हरदम निर्मल
पंछी गाते गीत सुहाने, लोकगीत- लोकनृत्य पुराने
हम तो है वन के आदिवासी हमे वनो मे ही रहने दो
हम गरीब है साहब, हमे वनो मे ही रहने दो
दो जून की रोटी मे ही, हमको संतोष से रहने दो

संतोष कुमार कोरी                                 (सागर म.प्र.)9990296064

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