छंद-दोहा-बजी चैन की बांसुरी…

II छंद – दोहे II

लौ व्यापत है एक ही, देखो जिस भी ओर….
इधर उधर क्यूँ भागते, भीतर नंदकिशोर…

कान्हा कान्हां मैं करूँ, कान्हा नज़र न आय…
कभी पकड़ लूँ जब उसे, भागे बात उलझाय…

इत् उत् भागूं बावरी, छलिया छल कर जाय…
प्रीत उसी से फिर करूँ, कान्हा समझ न आय…

कान्हा टेढ़ी चाल से, टेढ़ों को दे मात…
प्रेमारूप जगत्पते, फँसते प्रेम बिसात…

भूखे कान्हा प्रेम के, समझी मैं ये रोग…
भावों के ही भोग से, हुआ कृष्ण संयोग…

मन आलोकित हो गया, अंतस कहीं न शोर….
बजी चैन की बांसुरी, हुई सुनहरी भोर…
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/सी.एम्.शर्मा (बब्बू)

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7 Comments

  1. Bindeshwar prasad sharma 19/10/2019
    • C.M. Sharma 20/10/2019
  2. डी. के. निवातिया 19/10/2019
    • C.M. Sharma 20/10/2019
      • डी. के. निवातिया 21/10/2019
  3. SALIM RAZA REWA 20/10/2019
    • C.M. Sharma 20/10/2019

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