नारी

नारी तेरा जग में बहुत घटा है मान

जग को रचने वाली तू जग का तू अभिमान

जन-जन को है जानने वाली तू क्यों भूला इंसान

देख के तेरा यह अबलापन टूट पड़े शैतान

ममता तेरी करुणा तेरी भूल गया हर इंसान

मर्यादा की सीमा में रहकर खूब गवाई जान

नारी एक रूप बहुतेरे भूल गया हर इंसान

कहीं पर वह है मां किसी की कहीं बहन कहीं बेटी

रिश्तो की हर डोर टूट गई कान में पड़ गई ठेठी

उठ नारी अब जाग जरा तू बांध कमर क्या करती है

अम्बा तू है चंडी तू है फिर क्यों जग से डरती है

बहुत गवाया है अब तक तूने अब ना खोने पाएगा

जग में जो खोया सम्मान तुझसे ही वापस आएगा

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