मुझसे ऐ जान-ए-जानाँ – सलीम रज़ा

मुझसे ऐ जान-ए-जानाँ क्या हो गई ख़ता हैजो यक ब यक ही मुझसे तू हो गया ख़फ़ा हैटूटी हुई हैं शाख़ें मुरझा गई हैं कलियाँतेरे बग़ैर दिल का गुलशन उजड़ गया हैआंखें हैं सुर्ख़ रुख़ पर ज़ुल्फें बिखर रही हैंहिज्रे सनम में शब भर क्या जागता रहा हैतुमने तमाम खुशियाँ औरों के नाम कर दींतेरी इसी अदा ने दीवाना कर दिया हैफाँसी की सज़ा देकर ख़्वाहिश वो पूछते हैंअब क्या उन्हें बताएं क्या आख़िरी ‘रज़ा’ है

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6 Comments

  1. C.M. Sharma 18/10/2019
  2. Shishir "Madhukar" 19/10/2019
  3. डी. के. निवातिया 19/10/2019
  4. SALIM RAZA REWA 21/10/2019
  5. SALIM RAZA REWA 21/10/2019
  6. SALIM RAZA REWA 21/10/2019

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