मानव तन – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

मात्रा भार – 22 22 22 22

घर आँगन सब का कहना है
चंचल मन को सब सहना है।

जलते क्यों हो ? देखो दुनिया
तुमको भी इक दिन जलना है।

कर लो चाहे कोई तिकड़म
आँखों में आँसू भरना है।

साथी संगी देखन भर को
इक दिन तो सब को मरना है।

दुनिया दारी माया ममता
ऐसे ही जीवन चलना है।

धन दौलत की माया नगरी
फिर आपस में क्यों लड़ना है।

देखा – देखी क्यों करते हो
सच्चे हो तो क्यों ड़रना है।

मत खेलो तुम आँख मिचौली
सब को मिलकर ही रहना है।

मानव तन अनमोल है साथी
काहे औरों को ठगना है।

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3 Comments

  1. C.M. Sharma 16/10/2019
    • Bindeshwar prasad sharma 16/10/2019
  2. SALIM RAZA REWA 16/10/2019

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