शाम-ए-रंगीं गुलबदन गुलफा़म है- सलीम रज़ा

__________________________शाम-ए-रंगीं गुलबदन गुलफा़म हैमिल गए तुम जाम का क्या काम हैजिससे रोशन मेरी सुब्ह-ओ-शाम हैमेरे होटों पे फक़त वो नाम हैमेरा घर खुशिओं से है आरास्तामेरे रब का ये बड़ा इनआ’म हैधूप में साया हो जैसे छाँव काकाकुल-ए-जानाँ में यूँ आराम हैपा के सुर्खी़ आपके रुख़सार कीख़ूबसूरत आज कितनी शाम हैजिसके दम पर है मोहब्बत का वजूदवो हमारा मज़हब-ए-इस्लाम हैहम किसी से दुश्मनी करते नहींदोस्ती तो प्यार का पैग़ाम हैलोग कहते हैं बुरा कहते रहेंसाफ़ गोई में ‘रज़ा’ बदनाम है__________________________

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16 Comments

  1. डी. के. निवातिया 15/10/2019
    • C.M. Sharma 16/10/2019
      • डी. के. निवातिया 16/10/2019
        • C.M. Sharma 16/10/2019
          • डी. के. निवातिया 16/10/2019
      • SALIM RAZA REWA 27/10/2019
  2. C.M. Sharma 16/10/2019
  3. SALIM RAZA REWA 16/10/2019
  4. SALIM RAZA REWA 16/10/2019
  5. SALIM RAZA REWA 16/10/2019
    • डी. के. निवातिया 17/10/2019
  6. SALIM RAZA REWA 17/10/2019
    • डी. के. निवातिया 18/10/2019
  7. Shishir "Madhukar" 19/10/2019
  8. SALIM RAZA REWA 20/10/2019
  9. SALIM RAZA REWA 20/10/2019

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