उसे ख़्यालों में रखता हूँ – सलीम रजा

उसे ख़्यालों में रखता हूँ शायरी की तरहमुझे वो जान से प्यारी है ज़िंदगी की तरहतमाम उम्र समझता रहा जिन्हे अपनागया जो वक़्त गए वो भी अज़नबी की तरहमहक रहा है ज़माने का हर चमन जिनसेवो बेटियां हैं इन्हे खिलने दो कली की तरहकी जिसके आने से महफ़िल में उजाला बरसेये कौन आया है महफ़िल में रोशनी की तरहवो मेरा चाँद अगर छत पे आ गया तो ‘रज़ा’अंधेरी रात भी चमकेगी चांदनी की तरह

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8 Comments

  1. C.M. Sharma 14/10/2019
  2. SALIM RAZA REWA 14/10/2019
  3. Bindeshwar prasad sharma 14/10/2019
  4. SALIM RAZA REWA 14/10/2019
  5. डी. के. निवातिया 15/10/2019
  6. Shishir "Madhukar" 19/10/2019
  7. SALIM RAZA REWA 20/10/2019
  8. SALIM RAZA REWA 20/10/2019

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