मजबूत – शिशिर मधुकर

मचलता है दिल और सुलगती हैं सांसें
मिलन तुमसे फिर भी होता नहीं है
मुहब्बत तुम्हें भी जो है मुझसे इतनी
क्यों चैना तेरा मुझ सा खोता नहीं है

मेरी आंख में ना नमी कुछ दिखेगी
दिखने की मजबूत मजबूरियां हैं
इसे तुम कभी भी ये ना समझना
ये तनहा सा इंसा रोता नहीं है

कैसे करेंगे तुम्हें अब अलहदा
मुमकिन नहीं है ये इस जन्म में
जुदाई के गम को यूं ही तो इंसा
सांसों के ढलने तक ढोता नहीं है

कहर से लहर के हो जिसको बचाया
मझधार में अब उसे कैसे छोड़ें
जां को बचा के किसी आदमी की
इंसा उसे फिर डुबोता नहीं है

तेरी आरजू है हर पल जहन में
मुहब्बत ना ऐसी किसी ने लुटाई
तेरे ख्वाब आंखों में जब तक ना आएं
मधुकर कभी अब सोता नहीं है

शिशिर मधुकर

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2 Comments

  1. SALIM RAZA REWA 14/10/2019
    • Shishir "Madhukar" 19/10/2019

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