सुबह – सबेरे – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

सुबह

करवटें बदलती सुबह – सबेरे
अंगड़ाईयाँ लेकर आती हैं
पौ फटते ही हलचल हो जाती
नींदों को वो दूर भगाती हैं।

काग – कबूतर, गौरैया- मैना
कलनाद ये करने लगते हैं
स्वागत करती अपने सुरों में
सजाने महफिल ये लगते हैं ।

ताजी हवा ये लाकर है देती
हम सबका ख्याल वो रखती है
जितना भी बन पड़ता है उनसे
वह स्वागत में ही रहती है।

शुद्ध वातावरण हमें दिलाती
कुछ ऐसा एहसास कराती है
एक करामाती रोशनी लाकर
हम सबको उपहार दे जाती है ।

नित्य क्रिया से वह निवृत्त होना
हर रोज आकर हमें सिखाती है
व्यायाम – योग हो सुबह सबेरे
हर रोज याद हमें कराती है।

पूजा – पाठ, जलपान कराती
फिर कामों में वह हाथ बटाती
ख्याल पूरा रखती हम सबका
जीवन का ऐसा चक्र चलाती ।

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  1. Chandramohan Kisku 11/10/2019

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