विरह – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

विरह

विरह में तुम तड़पाते क्यों हो
नयन हमारे आते क्यों हो।
दिल से दूर हटाकर देखा
फिर भी पास बुलाते क्यों हो।।

क्या पागलपन मेरे मन में
आग लगी कब मेरे तन में।
क्यों मेरा दिल ये कैद हुआ
क्यों मेरा मिलना वैध हुआ।।

अब दूर रहे उनसे कैसे
बिन जल तड़पे मछली जैसे।
छुप छुप के मिलना ठीक नहीं
सब छूट रहा असली जैसे।

बाबुल की लाज बचानी है
सच उनसे बात बतानी है।
रास्ता वो एक निकालेंगे
वो हाथ मांगने जायेंगे।।

माँ की मदद रंग ले आई
बात बनी हो गयी सगाई।
कहता “बिन्दु” देखो तकदीर
सब के मन में उठा है पीर।।

Оформить и получить экспресс займ на карту без отказа на любые нужды в день обращения. Взять потребительский кредит онлайн на выгодных условиях в в банке. Получить кредит наличными по паспорту, без справок и поручителей

Leave a Reply