भगवती वंदना

निश्चल हो, स्वच्छंद हो मैया
सकल चराचर तारिणी,
रूप तेरा है अद्भुद है मैया,
ज्वाला भरी है कांति;
हृदय में ममता भी है मैया,
कर दे अब उद्धार…
जय भगवती…….
उच्चैठवासिनी भगवती…..

ब्रह्माजी को तूने बचाया,
मधु-कैटभ के बल से,
मोहिनी रूप में शिव को बचाया,
भष्मासुर के छल से,
और शुम्भ-निशुम्भ को मार दिए है,
अपने सहस्र कर से…
रक्तबीज का रक्त पी रही ;
हस्त-पात्र के नल से,
धर्म करे, कर्म युद्ध की भांति;
कर दिया मानव उत्थान…
जय भगवती……
उच्चैठवासिनी भगवती….

नारी है तू शक्ति रूपा,
शक्तिशाली तेरी छाया;
कलिया भी बन जाये काली,
समझे न तेरी माया;
दुनिया शीश झुकाये दर तेरे अकबर भी आया;
उन भक्तों को तू सरल है जननी;
जिन्होंने तुझको गाया….
श्रीराम धयाये.. कृष्ण धयाये… रावण भी ध्याता…
मैया मेरी, अम्बा मेरी, दुर्गा मेरी, काली मेरी…,
तू है कितनी गुणवती;
जय भगवती…..
उच्चैठवासिनी भगवती…..

सकल चराचर , तेरे उंगल,
चलती है यूँ कलकल…
जीवन-दायिनी जीवन भर और 
अविजित है रणभर….
पर्वत, पहाड़, झरने, नदियां
और ये सकल चराचर;
हंस, गाय, कोयल, मानव….
और सकल जीव धरापर
गुण तेरे ही गाते हरदम….तेरी ही तो व्युत्पत्ति
जय भगवती…..
उच्चैठवासिनी भगवती…..

निश्चल हो, स्वच्छंद हो मैया
सकल चराचर तारिणी,
रूप तेरा है अद्भुद है मैया,
ज्वाला भरी है कांति;
हृदय में ममता भी है मैया,
कर दे अब उद्धार…
जय भगवती…….
उच्चैठवासिनी भगवती…..

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