एक ग़ज़ल

गर हो नजर तुम जो तो ये लब खामोश होते हैं
होते नयनों से ओझल ही दिल भी होश खोते है

बसते ख्वाब मिलने को मेरे मन में अभी उनसे
जिनके दीदार को भी हम पल प्रति पल तरसते हैं

ग़ुम हैं किस जहाँ में वो अभी भी, छोड़कर मुझको
लगाकर दीठि राहों पर उन्हीं की बाट तकते हैं

ख्वाहिश थी मुझे भी उनकी बाहों से लिपटने को
मगर शबतन्हाई का ये पहरा जो रखते हैं

नहीं भूले हैं वो मुझको मेरा दिल ये कहता है
मजबूरी के पाशे भी, पैरों को जकड़ते हैं

धड़कता है ये दिल मेरा अभी भी नाम से उनके
पर हिचकी क्यों नहीं आती यही सवाल होते हैं

बोझ दर्द ए जुदाई का सहा मुझसे नहीं जाता
चले आओ कि बिन सावन नयन हरदम बरसते हैं

ये नजराना मेरे मौला है गर मेरी मोहब्बत का
जन्म अगले न देना मुझे दुआ करबद्ध करते हैं।।

नीरज कुमार द्विवेदी
बस्ती – उत्तर प्रदेश

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