सूखा – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

अपना उल्लू सीधा करना, दुनिया जाए भाड़ में
बदन रह गया सूखा – सूखा,भींगा नहीं असाढ़ में।

झोंका ऐसा हवा का आया
मुँख में पान चबा के आया।
होश उड़ाता रंग दिखाता
नैन दिखा के है इठलाता।

बादल गरजा बिजली चमकी,अटकी जाके ताड़ में
बदन रह गया सूखा – सूखा,भींगा नहीं असाढ़ में।

खेत – खलिहान सूखे सारे
किसान मरे भूख के मारे।
इसमें तो गरीब है रोता
आधे पेट ही खा के सोता।

खेत छोड़ कर पत्थर काटे, भटकते वो पहाड़ में
बदन रह गया सूखा – सूखा,भींगा नहीं असाढ़ में।

आम मनुज का हाल यही है
सूखा – सैलाब काल यही है।
पूछिये मत अमीर कौन है
उनका आज जम़ीर मौन है।

उनका महल-अटारी देखो, अपना घर है झाड़ में
बदन रह गया सूखा – सूखा,भींगा नहीं असाढ़ में।

भरोसा में जिंदा रहते हैं
ऐसे में दुख सब सहते हैं।
सपने गुनते अच्छा होगा
इक दिन तो सब सच्चा होगा।

क्या समझाये “बिन्दु”उनको,खुद ही पड़ा कबाड़ में
बदन रह गया सूखा – सूखा,भींगा नहीं असाढ़ में।

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3 Comments

  1. C.M. Sharma 05/10/2019
  2. डी. के. निवातिया 05/10/2019
  3. kiran kapur gulati 29/01/2021

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