मन्नू की आत्मजा

मि मि मि मि बोल रही हैकरवट लेकर वो लेटी हैशायद अब पहचान हो गई४ महीने की मेरी बेटी हैमम्मी पल भर दूर चली तोउसको अब यत्र तत्र ढूंढतीलेकिन अपने मित्र यहाँ हैउल्लहास से वो, जहाँ आँख मुंदतीसूरी चाचा, नीरज भैयाविधि बिधि हम सब पुकारेसुक्रिया उनका मैं कहता हुजो मिलने आते मेरे द्वारेकभी न हमको विरह देनाज्ञात हे ईश्वर हम सब है नश्वरसबको सारी खुशियाँ देनामेरे प्राण का पंछी लेकर”विधि” का ऐसा विधान तुम लिखनापुष्प सेज पर जीवन बीतेमानवता का परिचय बनानाव्यवहार से वो सबके मन को जीतेमेरी गुड़िया मेरी लड्डूमेरी नन्ही वो परी हैतेरा जीवन सींच रहा मैंमेरी इससे डाल हरी है.जीवन का मेला हर कोई अकेलापर ऐसा क्यों तार बुन गयातेरा चेहरा देख क्या लू मैंलगता न आज है कोई झमेलाएक ही मुस्कान, अन्नंत प्रेम कीकोई झरना है कोई फुलवारी हैइसको समझना बड़ा है मुश्किललेकिन हमारा प्रयास जारी है

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3 Comments

  1. C.M. Sharma 03/10/2019
  2. डी. के. निवातिया 05/10/2019

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