नैतिकता का पतन

स्वयम्भू की इस उर्वी पर क्या से क्या हो गया
मनुस्मृति में जो लिखा था,सब कहाँ खो गया
जिसकी ऊँचाइयाँ होती थी भूमिधर के शीर्ष तक
उस नैतिकता का नाम रत्नाकर की गहराई में खो गया
मैंने देखा एक पुत्र को पिता को डाँटते हुए
अपनी जननी को गालियों से दुत्कारते हुए
लेकिन कहीं जब आत्मभू सा जनक लालच में खो जाता है
तो पाल्य को हित रक्षा में आगे जाना होता है
मैंने देखा है कि कहीं तो प्रसून पर शर चल रहे हैं
इक मुद्रा की खातिर हया के पर्दे तार-तार हो रहे हैं
जब दुहिता अपने जनक के सामने कुछ ऐसे बैठी हो
कि वो नन्हे पाल्य को उसका हक पिला रही हो
वो भी बिना अतिरिक्त पट या आँचल से ढके हुए
तब मैंने जाना कि अब चक्षुओं से हया के जल उड़ गए
दोष दिया जाता है विशेष हम पुरुषों को
लेकिन बताओ कैसे बचाये हम उस मनुवाद को
हे जनार्दन! करो संचालन फिर से इस भव में नैतिकता
हे भूतेश_गिरीश_त्रिलोचन ! ईष्ट मेरे शिव मैं हाथ जोड़ता
घोर शर्वरी अनैतिकता का अब तुम ही संहार करो
जाह्नवी अब न कर पाएंगी, तुम ही सृष्टि का उद्धार करो
तुम ही सृष्टि का उद्धार करो।।
नीरज कुमार द्विवेदी

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