सरिता भ्रमण

बीता जो दिवस तो निशा फिर आई
लेकिन साथ में सोम किरण है लाई
क्षीर सी कौमदी चहुँ ओर है छाई
तटिनी तट घूमने की इच्छा हो आई
शर्वरी की वह बेला ले रही थी अँगड़ाई
पहुँच समीप सरिता जब दृष्टि घुमाई
मन हुआ प्रफुल्लित देख वो अमराई
तरंगिणी अपने दर्प में हिलोरें भी खाई
गंध दूर से मधुमास के पुहुप से आई
तभी कुछ दूर एक रमणी नजर आई
दक्षिण हस्त उसने एक ध्वजा लहराई
तब उस ध्वजा पर अपनी दृष्टि घुमाई
मैंने पढ़ा जो वहां पंक्तियाँ नजर आई
लिखा था हिन्दू_मुस्लिम_सिख_ईसाई

आपस में सब भाई ______भाई

नीरज कुमार द्विवेदी

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