श्रीराम—श्रीकृष्ण दोहे

देह जायतक थाम ले, राम नामकी डोर
फैले तीनोंलोक तक, इस डोरी केछोर

भक्तोंमें हैं कवि अमर, स्वामीतुलसीदास
‘रामचरितमानस’ रचा, रामभक्त ने ख़ास

राम-कृष्णके काज पर, रीझे सकलजहान
दोनों हरिके नाम हैं, दोनोंरूप महान

छूट गई मनकी लगन, कहाँ मिलेंगेराम
पर नारी कोदेखकर, उपजा तन मेंकाम

सियारामसमझे नहीं, कैसा हैये भेद
सोने काकैसा हिरन, हुआ नकुछ भी खेद

वाण लगा जब लखन को, रघुवर हुए अधीर
मै भी त्यागूँ प्राण अब, रोते हैं रघुवीर

मेघनादकी गरजना, रावन काअभिमान
राम-लखनतोड़ा किये, वक़्तबड़ा बलवान

राम चलेवनवास को, दशरथ नेदी जान
पछताई तबकैकयी, चूर हुआअभिमान

राजा दशरथके यहाँ, हुए रामअवतार
कौशल्यामाँ धन्य है, कियाजगत उद्धार

गीता मैश्री कृष्ण ने, कहीबात गंभीर
औरोंसे दुनिया लड़े, लड़ेस्वयं से वीर

लाल यशोदानंदका, गिरिधर माखनचोर
दिखता है मुझकोवहां, मै देखूं जिसओर

 रूप-रंग-श्रृंगारक्यों, नाचे मन मेंमोर
उत्साहित हैंगोपियाँ, कृष्ण सखीचितचोर

 गीतामें श्री कृष्ण ने, कहीबात गंभीर
अजर-अमरहै आत्मा, होवे नष्टशरीर

 राधेशरमाकर कहे, आवेमोहे लाज
बंसीबाजे कृष्ण की, भूलगई सब काज

 लड़ते-लड़तेलड़ गए, राधा प्यारीसे नैन
महावीर येहाल अब, कृष्ण हुएबेचैन

 निर्मलजमुना जल बहे, कृष्णखड़े हैं तीर
आजाओ अब राधिके, मनवाखोवे धीर

कृष्ण-सलोनारूप है, राधा हरिका मान
देह अलौकिकगंध है, प्रेम अमरपहचान

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3 Comments

  1. C.M. Sharma 03/10/2019
    • Mahavir Uttranchali 03/10/2019
  2. डी. के. निवातिया 04/10/2019

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