दास्ताँ – डी के निवातिया

चलते आ रहे जिस पर हम वो राह पुरानी है
मिलेंगे हमसफ़र अपने यही ये चाह पुरानी है

बीते लम्हो में, नीरस, कितनी उम्र गुजारी है
दास्ताँ हर एक पल कि लफ्जो में दोहरानी है

डी के निवातिया

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4 Comments

  1. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 30/09/2019
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 05/10/2019
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 30/09/2019
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 05/10/2019

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