अनमोल तोहफा – डी के निवातिया

मुझसे दूर जाकर, मेरे ओर करीब आ गई,
अमर होकर “माँ” तू अब मुझमे समा गई !!

नासमझ थी मैं, जो तुमको खोकर रोई,
मालूम न था, मैं तुमको सर्वस्व पा गई !!

सास्वत देखकर तुम्हे उतना पा न सकी,
न होकर भी होने का अहसास दिला गई !!

दूर होकर भी सदा तुमने पास अपने रखा मुझे,  
ये बात कितनी आसानी से तुम समझा गई !!

देकर “धर्म” का सहारा तूने बड़ा उपकार किया,
भटकी राहो में अनमोल तोहफा मुझे थमा गई !!

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डी के निवातिया

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2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 30/09/2019
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 05/10/2019

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