अपनों का मारा – डी के निवातिया

अपनों का मारा


खुदा का नहीं अपनों का मारा हूँ,
मैं खुद से नहीं ज़माने से हारा हूँ।

समझ न सका कोई मुझे, मैं भी,
इंसानी दुनिया का एक तारा हूँ !

मुझे फर्क नहीं पड़ता ज़माना क्या कहे,
मलाल ये है उसकी नजर में आवारा हूँ ।

कब से, इंतज़ार में हूँ, वो आये, कहे,
मैं उसकी जिंदगी का अहम् सितारा हूँ।

तुम ठहरे इठलाते इतराते बहते दरिया से,
“धर्म” ठहराव लिए स्तब्ध एक किनारा हूँ ।

स्वरचित: डी के निवातिया

खुदा का नहीं अपनों का मारा हूँ,
मैं खुद से नहीं ज़माने से हारा हूँ।
समझ न सका कोई मुझे, मैं भी,
इंसानी दुनिया का एक तारा हूँ !
मुझे फर्क नहीं पड़ता ज़माना क्या कहे,
मलाल ये है उसकी नजर में आवारा हूँ ।
कब से, इंतज़ार में हूँ, वो आये, कहे,
मैं उसकी जिंदगी का अहम् सितारा हूँ।
तुम ठहरे इठलाते इतराते बहते दरिया से,
“धर्म” ठहराव लिए स्तब्ध एक किनारा हूँ ।
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स्वरचित: डी के निवातिया

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4 Comments

  1. Bhawana Kumari 07/09/2019
    • डी. के. निवातिया 05/10/2019
  2. C.M. Sharma 12/09/2019
    • डी. के. निवातिया 05/10/2019

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