कर्मठ इंसान – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

नीति, विधि, दया – धर्म का, मत बदलो उसूल
बाकी को रख ताक पर, सब के सब फिजूल।

बात पते की हो अगर, और हो उपकार
जैसे स्वार्थ के बिना , खिल रहे सब फूल।

वह कर्मठ इंसान है, रखे सच को साथ
मानव वह शैतान है, करता ऊलजलूल।

माता- पिता या हो गुरु, सबका हो सम्मान
तेरे ही उपकार में , राम – बने रसूल।

अब तो सज्जन हम बने, करें हित की बात
प्रेम की वर्षा हो अगर , उड़े कभी न धूल।

आपस में दिल जोड़ के, करें जग कल्याण
क्यों जाते तुम नर्क को , क्यों चुभाते शूल ?

कर्म अपना प्रधान रख, निंदा करना छोड़
मायावी कुछ लोग हैं, कर जाते हैं भूल।

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2 Comments

  1. डी. के. निवातिया 09/09/2019
  2. C.M. Sharma 12/09/2019

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