जीवन के चार दिन – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

जीवन के चार दिन
भव बंधन के साये में, कौन यहाँ रहने आया
चार दिन के खेल – तमाशे, तुमसे कुछ कहने आया।

साथ नहीं जाना कुछ भी, लालच इतना क्यों करते
मिल जुलके रहना सीखो, मन को पागल क्यों करते।

धन-दौलत, महल-अटारी, काम नहीं कुछ आयेगा
क्यों मरते ऐसे इन पर, साथ नहीं कुछ जायेगा।

क्यों करते हेरा- फेरी, खून के प्यासे बनते हो
आतंकवादी बनके तुम, ओरों पर बरसते हो।

क्यों दिल, नहीं जोड़ते, क्या प्रेम नहीं करने आता
क्या स्वार्थ इतना अंधा है , यह समझ नहीं आता।

रावन का टूटा दंभ , तुम किस खेत की मूली हो
कर्म तेरा जीवन है , तुम इस धरा की धूली हो।

रिश्तों का ख्याल रखना, उसका ही धर्म निभाना तुम
अंतर मन नयनों से, कदाचार दूर भगाना तुम।

काव्य लोक अनुपम कृति बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु काव्य सरोवर

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3 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 29/08/2019
  2. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 30/08/2019
  3. arun kumar jha arun kumar jha 31/08/2019

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