लिखूं ना लिखूं

पिघलते पहाड़ों में
बर्फ से ढके पत्तों में
पानी के आंचल में
सोचता हूं मैं
लिखूं ना लिखूं।
सुबह की किरणों में
पंछियों के संगीतों में
शबनम की बूंदों में
सोचता हूं मैं
लिखूं ना लिखूं।
फूलों की खूशबुओं में
झूमती तितलियों संग
मदमस्त नाचती बेलों में
सोचता हूं मैं
लिखूं ना लिखूं।
घूमा बहुत बस्तियों में
ढूंढा खुद को किताबों में
बदले जो जीवन के रंग
सोचता हूं मैं
लिखूं ना लिखूं॥
…….. कमल जोशी …….

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  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 29/08/2019

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