अरुणोदय – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

ओस की कांतिमय कीरण

कमल कोपल के कोमल अधरों पर, छोड़ गयी शबनम की बूंदे
व्योम विभावरी सिसक – सिसक कर, बरसा गयी नम सी बूंदे।

अंशुमान की मनभावन किरणें, जब उन बूंदों पर पड़ती है
फिर देखो उन शबनम की बूंदें, कैसे आँखो पर चढ़ती है।

कांतिमय स्वर्णिम किरणें मन को, मनोहारी मोहन लगती है
छटा धरा की इन दृश्यों से, कितनी प्यारी यह दिखती है।

कितना शीतल कितना निर्मल, देखो कितना पावन है
सनन – सनन समीर पुरवाई, अरुणोदय पतीत पावन है ।

सूरज की सिंदूरी आभा, जब बिखरी तो जुगनू भागा
चाँद सितारे लुप्त हुए सब, जाग गये सारे खग कागा।

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  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 29/08/2019

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