चट्टान

अपने घर के दरवाजे से 

मैंने उफनते सागर को देखा 

फूलों का था नहीं निशान 

उस मरुस्थल को भी देखा॥

पत्थरों के आंगन में 

कई लोग फुसफुसा के चले 

मगर निष्ठुर यात्रा के स्वप्न में 

सदा एकाकी को सोचा॥ 

चलने फिरने की जगह ना थी 

कल्पना फिर भी ऊंची रही 

टकराया फर्शो से जब 

कुछ नावों को किनारे देखा॥ 

अनादि अनन्त पहुंचा जब

अपने गहरे अन्तर्मन में 

अंतहीन थकी रातों में 

सम्मोहित करती चट्टानों को देखा॥ 

….. कमल जोशी …..

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  1. vijaykr811 vijaykr811 20/08/2019

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