बांधती कैसे – शिशिर मधुकर

मिली तुझसे अधूरापन मेरा सब दूर हो गया
समाया तू यूं आंखों में कि इनका नूर हो गया

झुका ना तू किसी के सामने मुझको खबर ये थी
मगर उलफत के आगे तू मेरी मजबूर हो गया

मिली ना रूह जब तक रूह से भीतर अन्धेरा था
रोशनी से मगर जीवन भी अब भरपूर हो गया

मुसीबत थीं हमारे सामने पर दिल मचलता था
खुशी के वास्ते सहना दर्द मंजूर हो गया

पिलाती ना मैं आंखों से तो तुझको बांधती कैसे
तुझे मधुकर मगर अब कुछ अधिक सुरूर हो गया

शिशिर मधुकर

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