ग़ज़ल – मेरी उल्फत ज़रा नुरानी थी…

मेरी उल्फत ज़रा नुरानी थी…
टूटने की यही कहानी थी….

डूब कर भी न मैं पकड़ पाया….
मंज़िले इश्क़ बदगुमानी थी….

होलिका को मुग़ालता ही रहा…
आंच उस पर न कोई आनी थी….

चढ़ गया फिर ईमान सूली पे….
खुश हर इक आँख बेईमानी थी….

गुमशुदा से रहे वो महफ़िल में….
ज़हन में कोई सरगरानी थी….

जब बुढ़ापे ने उम्र जकड़ी तो…
सब अकड़ और गुम जवानी थी…

चाँद तू आसमान का ‘चन्दर’…
और फिर मेरी ज़िद्द पुरानी थी…

सरगरानी – सोच/फ़िक्र
\
/सी.एम्.शर्मा (बब्बू)

Оформить и получить экспресс займ на карту без отказа на любые нужды в день обращения. Взять потребительский кредит онлайн на выгодных условиях в в банке. Получить кредит наличными по паспорту, без справок и поручителей

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 18/08/2019
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 29/08/2019
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 29/08/2019

Leave a Reply