काश्मीर – इतिहास

लोगों ने पत्थर मारे फिर भी वो डटकर खड़ा रहा
नाको चने चबाने को दुश्मन के पीछे पड़ा रहा
हर सैनिक की आंखों में एक ख्वाब शांति का दिखता है
पर वो दिल्ली के हाथों से अपनी किस्मत लिखता है

झांको तो फिर देश धरम का आंखों में मंजर मिलता है
हाथ बने हथियार और नाखूनों में खंजर मिलता है
दुश्मन जो आगे बढ़ आये तो उसको ललकार दिखा दे
अटल प्रलय का परिचय देकर दिनकर की हुंकार दिखा दे

जहाँ मुखर्जी के सपनों को गला घोंट कर मार दिया
जहाँ कश्यप की तपस्याओं की घाटी को उजाड़ दिया
हरि सिंह ने जिसे भारत को देने का ऐलान किया
काश्मीर धरती के स्वर्ग को तुमने श्मशान किया

अल्पमतों के हिन्दू देखो कश्मीरी पंडित हो गये
कालखंड में रचे विधान क्षणभर में खंडित हो गये
षड्यंत्र रचा ऐसा जिसने भारत का नक्शा बदल दिया
पाकिस्तानी गद्दारों ने घर में घुसना सफल किया

भूले देश को नेहरू फिर अब्दुल्ला को अपनाया था
काट दिया माँ का शीश कपूत सा मुख दिखलाया था
इतिहासों के पृष्ठों में अब्दुल्ला की चतुराई थी
गांधी वाली गलती फिर से नेहरू ने दोहराई थी

गर गांधी ने जिन्ना को फांसी पर टांग दिया होता
नेहरू ने अब्दुल्ला की सीमा को लांघ दिया होता
फिर सीमा पर इतने सैनिक का बलिदान नही होता
काश्मीर अपना होता तब पाकिस्तान नही होता

मैं प्यार मोहब्बत के नगमे कहने वाला
सत्य अहिंसा की राहों पर चलने वाला
पर जब भी भारत माता को पीड़ा में देखा करता हूँ
मैं भी अपनी आंखों के फिर डोरे लाल किया करता हूँ

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

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