परहेज – शिशिर मधुकर

वो घड़ी फिर आएगी तुम चल के आओगे
तनहाई की अग्नि में खुद ही जल के आओगे

कब तक रहोगे हिम से जमे तुम दूर इस तरह
भड़केगी मन में आग तो फिर गल के आओगे

लब तक मिठास देने को वो पल भी आएगा
पानी में मिसरी की तरह तुम डल के आओगे

जब चाह लेगा वक्त तो मजबूर हो के तुम
मेरे पसंद के रूप में ही ढल के आओगे

परहेज है मुझसे तुम्हें जो आज इस कदर
मधुकर की महक एक दिन तुम मल के आओगे

शिशिर मधुकर

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