यूँ ही:-विजय

श्रीराम को यूँ ही राज न मिला
युधिष्ठिर को यूँ ही ताज न मिला
सबने काटे है अपने हिस्से का वनवास
यूँ ही किसी को देव का अलंकार न मिला

चाँद को यूँ ही चमक न मिला
धरती को यूँ ही बारिश का पानी न मिला
सबने सहे है अपने हिस्से की आग
यूँ ही सृष्टि को जीवन का ज्ञान न मिला

नदियों को यूँ ही पथ न मिला
धरती को यूँ ही सोना न मिला
सबने सहे है अपने हिस्से की चोटें
यूँ ही किसी को माँ का सम्मान न मिला

पथिक को यूँ ही मंजिल न मिला
व्रती को यूँ ही वरदान न मिला
सबने खर्च किये है उम्र जीवन के
यूँ ही किसी को यश का अमृत न मिला

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4 Comments

  1. डी. के. निवातिया 27/07/2019
    • vijaykr811 27/07/2019
  2. C.M. Sharma 29/07/2019
    • vijaykr811 29/07/2019

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