रचनाएँ – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

अपना बजूद यूं ही बचाते रहना
कर्तव्य अपना आप निभाते रहना
किस बात का मलाल करते हो भाई
दर्पन प्यार का आप दिखाते रहना।

आज गम है कल खुशियाँ आ जायेगी
आप दिल को दिलासा दिलाते रहना
विश्वास पर ही चलती है ये दुनिया
पीड़ा जिगर की आप छिपाते रहना ।

कौन कहता,परिश्रम काम नहीं आती
मुसीबतों को यूं ही मिटाते रहना
कोशिश पर ही तो अब चल रही दुनिया
जिंदगी अपनी यूं ही बिताते रहना।

बहु रूप देखे इस दुनिया में हमने
साथ सबके ही गले मिलाते रहना
कर्म – मर्म और धर्म बड़ी है सबसे
रस अमृत घोल सबको पिलाते रहना।

छल – कपट तेरे नहीं कभी हो मन में
इतना ही ज्ञान आप सिखाते रहना
भाईचारे की बात करे है “बिन्दु”
काम अपना जुबां से रिझाते रहना।


हार कर ही जीत की कहानी लिख दी
छल करनेवालों की जुबानी लिख दी।

सुना है जीतकर भी वो हार गये
इसलिए अपने दिल की रुहानी लिख दी।

जिसने सिखाया था हुनर जीतने की
उनके ही दिलों की हैरानी लिख दी।

भूल गये क़दर करना जज्बातों का
इतफाक से मन की शैतानी लिख दी।

क़फ़स में कैसे बंथ गये पता नहीं
समझे जब वो आत्म ग्लानि लिख दी।

रिश्ता बहुत दूर का था तो क्या हुआ
उसके नाम पर ही जिंदगानी लिख दी।

सोचता ही रहा “बिन्दु” कुछ इस कदर
अफ़सोस की कलम ने रवानी लिख दी।


हाइकु

आत्म चेतन
ज्ञान भंडार कक्ष
ईश्वर अंश।

निर्विकार है
कोई आकार नहीं
निराकार है।

सत्य का अर्क
अग्नि- जल – वायु है
वरदान है।

आत्म मंथन
सुक्ष्म जीव का रूप
परम सत्य।

सार तत्व है
प्राणयुक्त शरीर
अतिन्द्रीय है।


ऐसी संगति कीजिए, बना रहे बस प्यार
दुख – सुख में साथी बने, वही तुम्हारा यार।

कलियुग के इस प्रेम में, माया – ममता – लोभ
दिल मिलने पर जीत है, दिल टूटे तो हार ।

दिल का मिलना प्रेम है, जाने सकल जहान
यह अपनी पहचान है, यही प्रेम व्यवहार।

बहुत यार हैं मतलबी, स्वार्थ का यह खेल
हो जाता है काम जब , बरसाते अंगार।

ढ़ोंगी बनके आप से, मिलते हैं हर बार
चिकनी – चुपड़ी बात से , कर देते हैं वार।


आत्मा

तड़पती है आत्मा
जलती नहीं
रोती है आत्मा
मरती नहीं।।

तन बदलती है आत्मा
मन नहीं
आत्मा ही मन है
दिल नहीं।

दिल में निवास करती है
हृदय को प्रसन्न रखती है
मन चंचल सोचता है
व्याकुल रहता है।

अच्छे कर्मों पर
आत्मा तृप्त हो जाती है
बिना सोचे
हँसती हैं।


इनको छोड़ कहाँ चुप रहना
आ गये हम कहाँ छुप रहना।
बोलो मौसी काका – काकी
अच्छा लगता ना गुप रहना।।


माँ

कभी न देना दुख तुम अपने माँ को
उनको देना सुख तुम अपने माँ को।
जतन किये कितने तब पाला तुमको
प्रेम से भरो भुख तुम अपने माँ को।।

माँ से बढ़कर और न कोई दूजा
सब तीरथ बेकार और है पूजा ।
पिता आँख है पुतली उसकी माता
दुनिया में ये रिश्ता बड़ा अजूबा।।

तंग करो इनको भाई ठीक नहीं
उनका हक दे दो उनको भीख नहीं।
इनको कभी भटकने देना तुम नहीं
प्यार से समझाओ इनको चीख नहीं।।

उनको खुशी करो तुम भी खुशी रहो
उनको दुख दोगे अगर तो दुखी रहो।
उनका आशीर्वाद दिया जीवन है
माँ – बाप के चरण में तुम झुकी रहो।

इनको छोड़ चैन कहाँ तुम पाओगे
भटकोगे तुम भी जो तड़पाओगे।
कहे “बिन्दु” कर्म न अपना भूलो तुम
सेवा करो पार उतर तुम जाओगे ।।


क्या अपना क्या पराया क्या सब तुम्हारा है
अमीर को फिर से गरीबों ने ललकारा है।

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2 Comments

  1. C.M. Sharma 29/07/2019
  2. डी. के. निवातिया 30/07/2019

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