रचनाएँ – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

बादल के घूंँघट में बरखा
गरज गरज के बरसती है।
धरा हमारी बूंद – बूंद को
काहे को फिर तरसती है।।

इसका कारण है पर्यावरण
हम संभाल नहीं पाते हैं।
कहीं काट देते पेड़ों को
प्रदूषण रोक नहीं पाते हैं।।

कभी ये वरखा हमें रुलाती
कभी तो खूब हंसाती है।
कभी सुखाती खेतों को तो
कभी हरियाली लाती है।।

बादल गरजा बिजली चमकी
वह अपना रंग दिखाती है।
जल मग्न कर देती हैं नदियाँ
गली गली में फैलाती है।।

पानी का सैलाब कहर बन
हम सबों पर टूट पड़ता है।
तांडव करता शोर मचाता
इठलाकर आगे बढ़ता है।।

जान – माल की हानी होती
संकट में सब घिर आते है।
गरीब बेचारा ऐसे मर जाता
कुछ इक राहत भी पाते हैं।।

संतुलन खोती धरा हमारी
हम से अब वह कुछ बोल रही।
छेड़ – छाड़ न करना अब तुम
हिम्मत मेरी अब डोल रही।।

कहे “बिन्दु” अब दूर नहीं है
ऐसा संकट भी आयेगा।
पानी – पानी हर जगह होगा
पानी में ही डुब जायेगा।।


नगरी भोले नाथ की, बैजनाथ है नाम
केदार, विश्वनाथ जी, रहते अपने धाम।
रहते अपने धाम, भक्तों का संकट हरते
करते अपने काम, भक्त की झोली भरते।
जाये उनके द्वार, भर के गंग जल गगरी
तो रहता खुशहाल, अपना गाँव या नगरी।


थोड़ा विश्वास रखना तुम, हम लोग साथ हैं तेरे
हृदय में उजास रखना तुम, हम लोग साथ हैं तेरे।

साथी बनो अपनेपन का, छल – कपटों से दूर रहो
मन में उल्लास रखना तुम, हम लोग साथ हैं तेरे।

मीठी बात जो हैं करते , उनकी बातें सुन लेना
इतना आभास रखना तुम, हम लोग साथ हैं तेरे।

जो ज्ञान है सबमें बांटो, मन में मत अभिमान करो
यही एहसास रखना तुम, हम लोग साथ हैं तेरे।

माया – लोभ खेल निराला, इससे बच के रहना तुम
सभी में सुवास रखना तुम, हम लोग साथ हैं तेरे।

कर्म सत्य – धर्म है पूजा, ये जीवन का रेखा है
इसको ही पास रखना तुम, हम लोग साथ हैं तेरे।


प्रेमचंद की जीवन गाथा

अध्यापक, लेखक, पत्रकार
कथाकार – कलाकार
वाह रे उपन्यासकार
चमत्कार……..

कलमकार – साहित्यकार
ओजस्विता शिल्पकार
वाह रे रचनाकार
नमस्कार……

कथा सम्राट, आलेख विराट
हृदय धना ऊँचा ललाट
मन के द्वार खुले कपाट
विलकुल सपाट…….

आदर्शवादी – सत्याग्रही
राष्ट्रपोषक यथार्थवादी
यशस्वी – सत्यवादी
जीवन सादी…….

कुशल वक्ता संपादक
संवेदनशील संस्थापक
प्रेस विस्थापक
विचारक…….

अनुवादक – समीक्षक
सेवा भक्ति शिक्षक
वाह रे जीवन भिक्षक
परीक्षक……

सृजन का नाम प्रेमचंद
ग्राम लमही, धनपतराय
कष्टकारी जिंदगी
फिर भी मुस्कान ……

घुटन – चुभन प्रतिबिम्ब
चिंतन के चित्र
चरित्र वर्णन
साहित्य दर्शन विचित्र……

बहुमुखी, प्रतिभा के धनी
कृति उनकी अनमोल
नहीं सका कोई तौलना
जय हो इनकी बोल…….

मर्म स्पर्शी बात कही
दिल को छूते लफ्ज़
हिन्दी – उर्दू के ज्ञाता
सही टटोले नब्ज……


सावन शुक्ला सप्तमी, मुख से निकला राम
राम शब्द के नाम से, पहुँचे अपने धाम।

माता हुलसी चल बसी, पितृ का रहा न छाँव
भटके बहुत इधर – उधर, मिला कहाँ था ठाँव।

मत जन्मों का है अलग, पर अवध के वासी
पंद्रह सौ सबने कहा, फिर क्यों है उदासी।

जाति – पाति के भेद में, रखते केवल भाव
रोम – रोम में राम है, रोम – रोम सद्भाव।

गंगा के इस पार से, पहुँचे यमुना पार
आधी रात पहुँच गये, करने आँखें चार।

विरह व्याकुल मन हुआ, रत्नावली अवाक
जाओ वापस नाथ तुम, कट जायेगी नाक।

प्रेम जितना हमें किये, उतने में श्री राम
मिल जाते तुमसे गले, सुंदर मिलते धाम।

गुरुवर नरहरि दास थे, चेला तुलसी राम
आश्रम बीच पले – पढ़े,मिला जहाँ सम्मान।

रामचरित मानस रचे, बारह ग्रंथ महान
गोसाईं तुलसी बने , इतिहासों के जान।

बिन देखे वर्णन किये, राम कथा अनमोल
अंतस मन में झाँककर, दिये आँख सब खोल।

चौपाई – दोहावली, सोरठ – रोला – छंद
बड़े – बड़े विद्वान के, अक्ल पड़ गये मंद।

तुलसी संत महान छवि, हुए न दूजा कोय
राम नाम में रम गये, राम – राम में खोय ।

दास वश उर उतर गये, भक्ति में प्रभू राम
तुलसी हुए विभोर तब, कहाँ किये विश्राम ।


शोक आकुल व्याकुल है, देखो मृग को आज
स्वर्ण मृग मन मोहनी, बन बैठा हमराज।
बन बैठा हमराज, लगता सोच में डूबा
चिंतित हुआ उदास, लगे खोया महबूबा।
हिष्ट – पुष्ट बलवान, होकर पाया नहीं रोक
नर्म हरी घास पर, जाहिर करता है शोक।


मैं अपने अंतर के भावों से कैसे गीत सुनाऊँगा
कड़ी – कड़ी तो जोड़ूँगा पर राग कहाँ से लाऊँगा।

अपने मन से पूछूँगा दिल समझेगा तो बोलेगा
विचार गलत नहीं होते ये बंद अक्ल तो खोलेगा।
अपने जुनून को मैं कैसे बाहर तक दिखलाऊँगा
कड़ी – कड़ी तो जोड़ूँगा पर राग कहाँ से लाऊँगा।।

कौन है अपना कौन पराया किसको गले लगायेगा
जो आयेगा पहले उसको अपना प्रेम दिखायेगा
अपने हिम्मत के बलबूते अपना खेल दिखाऊँगा
कड़ी-कड़ी तो जोड़ूँगा पर राग कहाँ से लाऊँगा।।

है विश्वास मेहनत पर दुनिया में ऐसे छायेगा
इक दिन ऐसा आयेगा अपने ही धूम मचायेगा
हंसा – हंसा कर दिल बहलाकर ऐसे ही लुभाऊँगा
कड़ी-कड़ी तो जोड़ूँगा पर राग कहाँ से लाऊँगा।।

अपने सुंदर भावों को अब व्यर्थ न जाने दूँगा मैं
उठते हुए तरंगों को अब गर्त न जाने दूँगा मैं।
अपने पुंज प्रकाश से एक ऐसा दीप जलाऊँगा
कड़ी-कड़ी तो जोड़ूँगा पर राग कहाँ से लाऊँगा।।

मोहन प्यारे

चंदन सा है खुशबू इस चमन में जैसे वृंदावन में
मोहन प्यारे मन मोहन तुम जैसे हर कण – कण में।

तुम मोहन की प्यारी हो राधा मैं अदना सा प्रार्थी
बावली सी होकर मीरा जैसे बस गयी तन-मन में।

हम भी तो हैं अबोध बालख दास तुम्हारे चरणो के
अपनी प्रभुता की थोड़ी सी कृति भर देना जन-जन में।

महिमा अपरंपार पार तेरी कौन नहीं है जाना
कवीरा-रसखान बनाते एक ही घड़ी एक क्षण में।

इतनी दया तुम कर देना कर्म का फल देना सबको
सद्बुद्धि – ज्ञान प्रकाश भी देना सबको अंतस मन में।


लोग क्यों जीने लगे हैं अब बदगुमानी में
क्या भरोसा उठ गया उनका शादमानी में।

बेरूखी दुनिया से रूबरू होना सीख लो
अपनी राहें आप क्यों खो रहे नदानी में ।

वक्त पर खुद को बदलना तो आप सीखिये
जिंदगी बेमतलब डालते परेशानी में।

डालों पर बंदरों सा चलना तो बंद करो
इंसान बनो क्यों फंसते बेईमानी में।

प्रेम भाईचारे की बात खुलकर कीजिये
जिंदगियाँ संवर जाती है मीठी वाणी में।

बातें गलत है धोखे में रहना या देना
जिंदगी बिगड़ जाती इस तरह मनमानी में।

दिल से दिल की बात रिश्तों में की जाती है
रावण यूंही मारा गया है अभिमानी में।

आईने की तरह हकीकत सदा साथ रखो
कुछ भी नहीं मिलेगा तुम्हें बदजुबानी में।


दिल से दिल की बात

लोग क्यों जीने लगे हैं अब बदगुमानी में
क्या भरोसा उठ गया उनका शादमानी में।

बेरूखी दुनिया से रूबरू होना सीख लो
अपनी राहें आप क्यों खो रहे नदानी में ।

वक्त पर खुद को बदलना तो आप सीखिये
जिंदगी बेमतलब डालते परेशानी में।

डालों पर बंदरों सा चलना तो बंद करो
इंसान बनो क्यों फंसते बेईमानी में।

प्रेम भाईचारे की बात खुलकर कीजिये
जिंदगियाँ संवर जाती है मीठी वाणी में।

बातें गलत है धोखे में रहना या देना
जिंदगी बिगड़ जाती इस तरह मनमानी में।

दिल से दिल की बात रिश्तों में की जाती है
रावण यूंही मारा गया है अभिमानी में।

आईने की तरह हकीकत सदा साथ रखो
कुछ भी नहीं मिलेगा तुम्हें बदजुबानी में।


प्रीत तेरा मन भावन लागे
रिमझिम जैसे सावन लागे ।

तू जो हंसती फूल झरे है
जब देखो तो आह भरे है ।
मस्त फिजाँ मनमानी करती
यौवन रस श्रृंगार झरे है।।

मन ये तेरा पावन लागे
रिमझिम जैसे सावन लागे…..


मुँह खोलो तो मोती झरते
तुम बोलो तो हम भी मरते।
तेरा कितना रूप सलोना
गर्म जवानी ऐसे में जलते।।

मधुर मिलन सुहावन लागे
रिमझिम जैसे सावन लागे….


बदन तेरा अंगूरी लागे
नयन नक्स सिंदूरी लागे।
चाल तेरी नागन के जैसी
नखरे – वखरे नूरी लागे।।

हर इक अदा रिझावन लागे
रिमझिम जैसे सावन लागे…..


झूले देखो बाग – बगिया में
चहलकदमी देखो सखिया में।
कोई ठुमरी – कजरी गाये
विरह वेदना के अगिया में।

आते जैसे कि साजन लागे
रिमझिम जैसे सावन लागे…..


चाहत है अगर कुछ भी मन में, ध्यान उसपर जमा दीजिये।
सोया दिल जो अगर है तुम्हारा आप उसको जगा लिजिये
हम भी तो देखें तुम्हारी जादुई आँखों में दम है कितना
मेरी रूह में आप उतर कर देखो आँखों में हम हैं कितना।
इश्क आँखों का मेल नहीं दिल में समा जाने का जरिया है
दिल उसको निहार लेता है आप की आँख में तम है कितना।


समंदर में चाँद का ये रक्स है कैसा
नज़रों को तंग किया जो रश्क है कैसा।
बड़ी अज़ीज़ सी लगती है ये नजरों पर
तंहा मुहब्बतों का ये अश्क है कैसा।


प्रीत सावन की

प्रीत तेरी मन भावन लागे
रिमझिम जैसे सावन लागे ।

तू जो हंसती फूल झरे है
जब देखो तो आह भरे है ।
मस्त फिजाँ मनमानी करती
यौवन रस श्रृंगार झरे है।।

मन ये तेरा पावन लागे
रिमझिम जैसे सावन लागे…..

मुँह खोलो तो मोती झरते
तुम बोलो तो हम भी मरते।
तेरा कितना रूप सलोना
गर्म जवानी से हम भी जलते।।

मधुर मिलन सुहावन लागे
रिमझिम जैसे सावन लागे….

बदन तेरा अंगूरी लागे
नयन नक्स सिंदूरी लागे।
चाल तेरी नागन के जैसी
नखरे – वखरे नूरी लागे।।

हर इक अदा रिझावन लागे
रिमझिम जैसे सावन लागे…..

झूले देखो बाग – बगिया में
चहलकदमी देखो सखिया में।
कोई ठुमरी – कजरी गाये
विरह वेदना के अगिया में।

आते जैसे कि साजन लागे
रिमझिम जैसे सावन लागे…..


समंदर में चाँद का ये रक्स है कैसा
नज़रों को तंग किया जो शख़्स है कैसा।
बड़ी अज़ीज़ सी लगती है ये नजरों पर
तंहा मुहब्बतों का ये अश्क है कैसा।


विद्या – माहिया

तुम प्रेम कहानी हो
मैं राजा तेरा
तुम दिल की रानी हो।

यह रिश्ता बंधन है
पावन रस धारा
जो साथ निभाता है।
प्रेम नहीं खेला हे

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One Response

  1. डी. के. निवातिया 30/07/2019

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