ग़ज़ल – मुझे तोडा नज़र तेरी ने हर इलज़ाम से पहले….

झुकी है आँख उसकी डर में अब अंजाम से पहले…
कि सूरज ढल गया है आज तो बस शाम से पहले…

मकाँ को छोड़ कर मुझको हरिक दिल घर बसाना है…
मरूं क्यूँ रोज़ हर पल ही मैं जीवन शाम से पहले….

वफ़ा में चाँद तारे टांक दिए सब उसकी चूनर पे…
मगर मैं लुट गया सरेराह मंज़िले गाम से पहले…

नज़र थी आसमाँ पर ओ दिवारें खींच ली ऊंची….
हवा के एक झोंके ने ढहाया बाम से पहले….

जहाँ की तुहमतें ‘चन्दर’ हिला मुझको नहीं पायीं…
मुझे तोडा नज़र तेरी ने हर इलज़ाम से पहले….
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/सी.एम्.शर्मा (बब्बू)

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6 Comments

  1. davendra87 26/07/2019
    • C.M. Sharma 29/07/2019
  2. डी. के. निवातिया 27/07/2019
    • C.M. Sharma 29/07/2019
  3. Shishir "Madhukar" 28/07/2019
  4. C.M. Sharma 29/07/2019

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