सावन – छंद चौपाई….

II छंद – चौपाई IIकारे कारे बादल आये, मन मेरे को नाच नचाये….मेघा गरजे बिजली चमके, डर कर मेरा मनवा दुबके…देखूं राह मैं चढ़ अटरिया, कब आएंगे पिया नगरिया…घूमूं पागल सी इधर उधर, पायल भी मेरी गयी बिखर…आग लगे काले सावन को, बैरी बरसे है जम जम जो…साजन घर को कैसे आये, भर भर नदिया नाले आये…कौन सुने है मुझ बिरहन की, पीर कहूँ किसको मैं मन की…अपना चहरा मुझे न भाता, देख मुझे दर्पण भय खाता…झूम झूम कर गायें सखियाँ, मन बहका भर आयी अखियाँ..पर मैं गाऊँ संग ही तेरे, झूला झुलाये पि तू मेरे…हँसतीं हैं सब सखी सहेली, मैं अपनी भी बनी पहेली…कोई मुझको कहे बावरी, प्रीत लगा मैं हुई साँवरी…यूं तो मौसम आते जाते, हर पल तेरी याद दिलाते….जब भी फूल खिलें आँगन में, हँसते दिखते हो तुम उनमेंमन भंवरा समझाऊँ कैसे, सावन आग लगाए ऐसे …जलता है मेरा सब तन मन, आ भी जाओ अब तुम साजन…\/सी.एम्.शर्मा (बब्बू)

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4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 22/07/2019
    • C.M. Sharma 26/07/2019
  2. डी. के. निवातिया 23/07/2019
    • C.M. Sharma 26/07/2019

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