दो दाँत

दो दाँतफलों की टोकरी में फल रखे सेब केबाजार से लाई थी चुनकर माँ देख के।सुंदर सजीले मधुर स्वाद केचमकदार सारे बेदाग से।था एक सेब अधकुतरा हुआमाँ ने न जाना कि ये कब हुआ।घर मे न चूहे न बिल्ली का आनाफल किसने कुतरा कोई तो बताना।तभी लुढ़कता एक और फल आयाबिटिया ने फेंका उछल कर आया।कुतरा हुआ वह भी पहले जैसामाँ ने समझा क्यों हुआ आज ऐसा।पूरी हुई यूँ माँ की तहक़ीक़ातजब दिखे बिटिया के पहले दो दाँत। -देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 20/07/2019
  2. C.M. Sharma 22/07/2019
  3. डी. के. निवातिया 22/07/2019

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