बात छोटी थी बड़ी हो गई

बात छोटी थी बड़ी हो गईवो लड़की अपने पैरों परखड़ी हो गईहोना था वहीजो हुआ है अभीफिर शोर क्यों हैकि गड़बड़ी हो गई। तुम अहम के अधीनभ्रम रच रहे नवीनभूलकर मूल कोबांट रहे शूल कोतुम जो अस्तित्व होतो उससे ही अस्तित्व हैशक्ति के प्रतीत्व का वह अभीष्ट तत्व है।क्यो नही स्वीकारते जो चिर सत्य हैतुम्हारे ही समानउसका भी अमर्त्य है।सृष्टि की संभावना कोअवरुद्ध क्यों कर रहेजीवनी शक्ति कोक्रुद्ध क्यों कर रहे।अपने ही लहू का रंगअलग क्यों दिख रहा कौन है अज्ञानता कालेख जो लिख रहा।विनाश ही प्रवृत्ति हैअहम और अज्ञान कीबाते सारी झूठ हैतुम्हारे स्वाभिमान की।कृतज्ञता के भाव से तुम्हे पुकारते हुएआशीष दो उसे किवह आसमान को छुए।गर्व से कहो कि सब बंधनो से बरी हो गईहां! वो लड़की अपने पैरों पर खड़ी हो गई। -देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 20/07/2019
  2. C.M. Sharma 22/07/2019
  3. डी. के. निवातिया 22/07/2019

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