झूठा प्यार

जाने क्या है ऐसा जो दिल मे मेरे चुभता हैधीरे-धीरे रिसता हैभीतर ही भीतर जलता हैटूटता है ,बिखरता हैना संभले संभलता हैकिस्मत ने कैसी खींची है लकीरेसब कुछ है झोली मेफिर भी हूँ फ़कीरा रेतेरा मेरा साथ तो लिखा उस विधाता नेपर तेरा मेरा हो कर रहनाक्यों गंवारा नहीं उसेऐसा भी क्या खेल किसी सेरब खेलता हैतुम ही बताओ नाकैसे सह लूँ ये तन्हाईकैसे देखूँ तुम्हारे हाथों मेंकिसी और के नाम की मेहंदीआँखों से फूटती है रुलाईझूठा तो नहीं था मेरा प्यारफिर कैसे तुमने होने दिया खुद कोकिसी और कासाथ थी भी तुम कभीया बस बहला रही थी मुझेऔर निभा रही थी अपना झूठा प्यार—अभिषेक राजहंस

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3 Comments

  1. davendra87 21/07/2019
  2. C.M. Sharma 22/07/2019
  3. डी. के. निवातिया 22/07/2019

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