सकता हूँ:-विजय

शून्य में भी सहज रहता हूँशिखर तक भी जा सकता हूँमुमकिन न हो जो इस धरा परमुमकिन उसको मैं कर सकता हूँबैर खालीपन से न मैं रखता हूँयाराना महफ़िल से भी रखता हूँदिल में सबके लिए प्रेम रखा हूँऔर प्रेम का भूखा मैं रहता हूँदुःख में विचलित न मैं होता हूँसुख में न मद में रहता हूँमानुष इस माटी का मैं हूँजुड़ा माटी से सदा मैं रहता हूँवक़्त का रथ जो दौड़ रहा हैरोक उसे भी मैं सकता हूँखुद में है विस्वास कि इतनाभगवान को सम्मुख ला सकता हूँ

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6 Comments

  1. C.M. Sharma 18/07/2019
    • vijaykr811 18/07/2019
  2. डी. के. निवातिया 22/07/2019
    • vijaykr811 26/07/2019
  3. naim 29/01/2020
  4. deveshdixit 30/01/2020

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