वो शफ़क़ शर्म हया तेरी भुला भी न सकूं…

इश्क़ ज़ंजीर बनी खुद को छुड़ा भी न सकूं….ज़ख्म पैराहन-ए-वफ़ा मैं सिला भी न सकूं….ज़िन्दगी रोज़ मुझे मिल के बिछड़ जाती है…टूटते दिल में बसाऊं क्या बिठा भी न सकूं…शाम अटकी है मेरी चाँद हिना हाथों पे..वो शफ़क़ शर्म हया तेरी भुला भी न सकूं…वो समझ पायें वफ़ा इतनी तो उम्मीद नहीं…पर तगाफुल-ए-सज़ा उनकी भुला भी न सकूं…सांस भी कैसे तेरे नाम करूँ मैं ‘चन्दर’…जो चला भी न सकूं और बढ़ा भी न सकूं…\/सी.एम्.शर्मा (बब्बू)

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6 Comments

  1. Bindeshwar Prasad sharma 15/07/2019
    • C.M. Sharma 19/07/2019
  2. Shishir "Madhukar" 16/07/2019
    • C.M. Sharma 19/07/2019
  3. डी. के. निवातिया 22/07/2019
    • C.M. Sharma 26/07/2019

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